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ग़ज़ल
मंज़िलें गर्द की मानिंद उड़ी जाती हैं
अबलक़-ए-दहर कुछ अंदाज़-ए-तग-ओ-ताज़ तो दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
हर एक गाम पे दिल पीस्ता है अबलक़-ए-चश्म
मगर है सुरमे का दुम्बाला ताज़ियाना-ए-इश्क़
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
ग़ज़ल
वस्ल है इक शहसवार-ए-हुस्न से शाम-ओ-सहर
है इनान-ए-अबलक़-ए-गर्दूं हमारे हाथ में
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
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aabla
आबला آبْلَہ
किसी स्थान पर जलने, रगड़ खाने या और किसी कारण से उत्पन्न चमड़े की ऊपरी झिल्ली का फूलकर उभरा हुआ तल जिसके भीतर एक प्रकार का चेप या पानी भरा रहता है, छाला, फफोला, फुटका
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ग़ज़ल
अबलक़-ए-चश्म-ए-सनम किस नाज़ से गर्दिश में है
ख़ूब कावे होते हैं रहवार आँखें हो गईं
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
ग़ज़ल
क्या क्या दिखाई सैर-ए-सफ़ेद-ओ-सियाह-ए-दहर
किस किस तरफ़ को अबलक़-ए-अय्याम ले गया
मुनीर शिकोहाबादी
लेख
रिज़्वानुद्दीन फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
साया-ए-अबलक़-ए-शजर घात में चश्म-ए-नीम-वा
पाँव जहाँ थे जम गए होश-ए-फ़रार किस को था
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
सुर्मा जो ज़ेब-ए-चश्म-ए-सियह-फ़ाम हो गया
फ़ित्ना सवार-ए-अबलक़-ए-अय्याम हो गया
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
अबलक़-ए-चश्म-ए-बुताँ की शोख़ियाँ चकरा गईं
आसमाँ पर मेहर-ओ-मह करते हैं सुब्ह-ओ-शाम रक़्स
बयान मेरठी
ग़ज़ल
किसू के अबलक़-ए-अय्याम चढ़ने का नहीं राज़ी
अज़ल से 'हातिम' इस तौसन में ऐब-ए-बद-रिकाबी है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
नज़्म
इस छालिया के पेड़ के नीचे
मिट्टी उगाइए कि ज़मीं शोरा-पुश्त है
और ये कि मीश-ओ-इबलक़-ओ-उश्तुर के वास्ते
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
ग़ज़ल
भूले से काश वो इधर आएँ तो शाम हो
क्या लुत्फ़ हो जो अबलक़-ए-दौराँ भी राम हो









