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ग़ज़ल
लैलतुल-क़द्र है ऐ माह तिरा ख़त्त-ए-सियाह
सुब्ह यौम-उल-'अरफ़ा नूर-ए-दयार-ए-आरिज़
शाह अकबर दानापुरी
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'arafa
'अरफ़ा عَرَفَہ
अरबी ज़िल-हिज्जह की नौवीं तारीख़ उस दिन हाजी अरफ़ात के मैदान में जा कर ठहरते हैं और हज के निर्धारित कामों को करते हैं
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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
मस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहे
यानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
वो सिब्तैन-ए-मोहम्मद, जिन को जाने क्यूँ बहुत अरफ़ा
तुम उन की दूर की निस्बत से भी यकसर मुकर जाना
जौन एलिया
ग़ज़ल
जिस को ख़ुद मैं ने भी अपनी रूह का इरफ़ाँ समझा था
वो तो शायद मेरे प्यासे होंटों की शैतानी थी
जौन एलिया
नज़्म
एक नौ-जवान के नाम
न हो नौमीद नौमीदी ज़वाल-ए-इल्म-ओ-इरफ़ाँ है
उमीद-ए-मर्द-ए-मोमिन है ख़ुदा के राज़-दानों में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया
सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
फड़क उठ्ठा कोई तेरी अदाए मा-'अरफ़ना पर
तिरा रुत्बा रहा बढ़-चढ़ के सब नाज़-आफ़रीनों में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं
फ़ैज़ान-ए-मोहब्बत आम सही इरफ़ान-ए-मोहब्बत आम नहीं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं
मुझे मसरूर करते हैं वो लम्हे आज भी 'इरफ़ान'
इरफ़ान अहमद मीर
नज़्म
ज़रा सी बात
तख़लिए की बातों में गुफ़्तुगू इज़ाफ़ी है
प्यार करने वालों को इक निगाह काफ़ी है





