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ग़ज़ल
गाल की जानिब झुकती है शरमाती है हट जाती है
आज इरादा ठीक नहीं है जान तुम्हारी बाली का
मुमताज़ गुरमानी
ग़ज़ल
सदक़े होती हैं बराबर उन कलाई पहोंचों पर
गिर्द फिरती हैं ख़ुशी से बारी बारी चूड़ियाँ
मुनीर शिकोहाबादी
नज़्म
हिलाल-ए-माह-ए-रमज़ान देख कर
जब ख़ुदा का डर नहीं तो फ़िक्र-ए-उक़्बा क्यूँ रहे
फ़ारिग़-उल-बाली में कोई भूका प्यासा क्यूँ रहे
मुख़तसर आज़मी
ग़ज़ल
मेहंदी में लाली जिस तरह कानों में बाली जिस तरह
जब यूँ मिले तो क्या चले दुनिया का हम पे दाँव रे










