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नज़्म
मुफ़्लिसी
माँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती है
बेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दिल में वो ज़ख़्म खिले हैं कि चमन क्या शय है
घर में बारात सी उतरी हुई गुल-दानों की
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ
शे'र की मैं तहज़ीब बना हूँ या अपने हालात लिखूँ







