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नज़्म
औरत
'हिंदा' है तो सालारी का दिखलाती है जौहर
है 'राबिया-बसरी' तो ये वलियों की है हम-सर
रहबर जौनपूरी
नज़्म
नूर-जहाँ का मज़ार
क्या आलम-ए-बेचारगी ऐ ताज-वरी है
दिन को यहीं बिसराम यहीं शब-बसरी है
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
ये लड़की कमज़ोर सी लड़की मरियम भी है ज़ोहरा भी
राबिया-बसरी बनी तो फिर वलियों से बढ़ गई बेटी
समीना असलम समीना
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ग़ज़ल
आग़ाज़ अपना वहशत बसरी अंजाम अपना शोरीदा-सरी
हम आज भी हैं बदनाम बहुत हम कल भी निहायत रुस्वा थे
अकबर हैदरी कश्मीरी
ग़ज़ल
न वो रस्म-ए-पर्दगी-ए-वफ़ा न छुपा छुपा सा पयाम है
न शमीम-ओ-गुल से कलाम है न सबा की नामा-बरी रही
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
शत्तुल-अरब
नवाह-ए-बसरा में फैलती बद-गुमान सुब्हें
फ़ज़ा में बे-नाम सिसकियों की शिकस्ता-लहरें










