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नज़्म
जुगनू
इसी के बीच में है एक पेड़ पीपल का
सुना है मैं ने बुज़ुर्गों से ये कि उम्र उस की
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
बिस कि हैरत से ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-ज़िन्हार है
नाख़ुन-ए-अंगुश्त-ए-बुत ख़ाल-ए-लब-ए-बीमार है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
तौसी-ए-शहर
बीस बरस से खड़े थे जो इस गाती नहर के द्वार
झूमते खेतों की सरहद पर बाँके पहरे-दार
मजीद अमजद
शेर
बीस बरस से इक तारे पर मन की जोत जगाता हूँ
दीवाली की रात को तू भी कोई दिया जलाया कर
माजिद-अल-बाक़री
ग़ज़ल
बीस इक्कीस बरस पीछे हमें कब तक मिलते रहना है
देखो, अब की बार मिलो तो दिल की बात बता देना
इरफ़ान सिद्दीक़ी
हास्य
शौहर की तबाही की ख़ातिर बस एक ही औरत काफ़ी है
ये बात न सब पर ज़ाहिर हो तो साहिब दौलत काफ़ी है
पॉपुलर मेरठी
ग़ज़ल
मैं नहीं हूँ माँगता दस बीस तुम से या पचास
सिर्फ़ दो बोसा लब-ए-शीरीं के हँस कर अब के दो










