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नज़्म
मुर्दा-ख़ाना
बड़ी बिसांद है ठिठुरती हुई हवाओं में
मैं घिर गया हूँ लहू चाटती बलाओं में
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
रात के पिछले पहर
शाम ही से थी फ़ज़ा में किसी जलते हुए कपड़े की बिसांद
और हवा चलती थी जैसे
शकेब जलाली
नज़्म
करमों का फल
सारे नाते ख़ुशबुओं की तरह नहीं होते
इन में दलदलों की बिसांद भी होती है
शाइस्ता हबीब
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विषय
बिसात
बिसात शायरी
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नज़्म
कड़वे तल्ख़ कसीले ज़ाइक़े
शाम के काले सियाह माथे की नंगी मख़रूती ख़ारिश
दोपहरों के जलते गोश्त की तेज़ बिसांद
तबस्सुम काश्मीरी
शेर
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
शिकवा
तुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थे
तेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
नज़्म
एक आरज़ू
इस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नाले
तारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ब-सद दिल दानिशी गुज़रान अपनी मुझ पे तारी की
बहुत उस ने पिलाई और पीने ही न दी मुझ को





