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नज़्म
रोटियाँ
इन रोटियों के नूर से सब दिल हैं बोर बोर
आटा नहीं है छलनी से छन-छन गिरे है नूर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
यादें
गुज़री बात सदी या पल हो गुज़री बात है नक़्श-बर-आब
ये रूदाद है अपने सफ़र की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
हास्य
राजा मेहदी अली ख़ाँ
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हास्य
वो जब दौरान-ए-लेक्चर बोर सी हो जाया करती थी
तो चुपके से कोई ताज़ा-तरीन अफ़्साना पढ़ती थी
सरफ़राज़ शाहिद
नज़्म
रोए भगत कबीर
महफ़िल से जो उठ कर जाए कहलाए वो बोर
अपनी मस्जिद की तारीफ़ें बाक़ी जूते-चोर
हबीब जालिब
नज़्म
होली
जो कोई सियानी है इन में तो कोई है ना-कुनद
वो शोर-बोर थी सब रंग से निपट यक चंद
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
शौहर की फ़रियाद
शब के पुर-तस्कीन लम्हों में न मुझ को बोर कर
इस सआदत-मंद शौहर को न यूँ इग्नोर कर
असद जाफ़री
नज़्म
अपने दिल में डर
जो इन बोर लदे अंदेशों पर यूँ झुकी हुई है आमों के बाग़ों में
मिरी रूह के सामने
मजीद अमजद
ग़ज़ल
हसन अब्बास रज़ा
नज़्म
बल्लेबाज़
जब पढ़ाई करते करते बोर हो जाता हूँ मैं
दाब कर बल्ला बग़ल में फ़ील्ड पर आता हूँ मैं





