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नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
चंग ओ नय रंग पे थे अपने लहू के दम से
दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज़ का रंग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
नौ-जवान से
सदा-ए-तीशा-ए-मज़दूर है तिरा नग़्मा
तू संग-ओ-ख़िश्त से चंग-ओ-रुबाब पैदा कर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
होली
कुछ झड़पें बीन रबाबों की कुछ सारंगी और चंग बजी
कुछ तार तम्बूरों के झनके, कुछ ढमढी और मुँह-चंग बजी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
औरतें बेचेंगी जब स्टेज पर बा-रक़्स-ओ-चंग
अपनी आँखों की लगावट अपने रुख़्सारों का रंग
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
ख़त-ए-नौ-ख़ेज़ नील-ए-चश्म ज़ख़्म-ए-साफ़ी-ए-आरिज़
लिया आईना ने हिर्ज़-ए-पर-ए-तूती ब-चंग आख़िर












