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ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
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ग़ज़ल
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ
कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तसव्वुर
नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू
तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू
कैफ़ी आज़मी
शेर
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ
कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल
आज हर मौज-ए-हवा से है सवाली ख़िल्क़त
ला कोई नग़्मा कोई सौत तिरी उम्र दराज़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
आख़िरी मुलाक़ात
बरसा लबों से फूल तिरी उम्र हो दराज़
सँभले हुए तो हैं प ज़रा डगमगा तो लें
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
एक रह-गुज़र पर
गुदाज़ जिस्म क़बा जिस पे सज के नाज़ करे
दराज़ क़द जिसे सर्व-ए-सही नमाज़ करे





