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ग़ज़ल
न तुमतराक़ को ने कर्र-ओ-फ़र को देखते हैं
हम आदमी के सिफ़ात ओ सियर को देखते हैं
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
नज़्म
इल्म की ज़रूरत
यही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत पर
यही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारी
अहमक़ फफूँदवी
ग़ज़ल
फ़ैसला बिछड़ने का कर लिया है जब तुम ने
फिर मिरी तमन्ना क्या फिर मिरी इजाज़त क्यूँ
अंबरीन हसीब अंबर
नअत
सलाम उस ज़ात-ए-अक़्दस पर सलाम उस फ़ख़्र-ए-दौराँ पर
हज़ारों जिस के एहसानात हैं दुनिया-ए-इम्काँ पर
जगन्नाथ आज़ाद
ग़ज़ल
ख़लाओं में चला जाता हूँ अक्सर घूमने को मैं
ज़मीं पर फैली नफ़रत है ज़रूरत से ज़ियादा ही
आदित्य श्रीवास्तव शफ़क़
ग़ज़ल
ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है
ये आग इश्क़ की यारब किधर से उतरी है
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
नज़्म
'मीर'
है अदब उर्दू का नाज़ाँ जिस पे वो है तेरी ज़ात
सर-ज़मीन-ए-शेर पर ऐ चश्मा-ए-आब-ए-हयात
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
हास्य
इस छत पे कमंद अपनी मैं फेंकूँगा घुमा कर
हिम्मत दे मुझे इतनी कि चढ़ जाऊँ मैं फ़र-फ़र



