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ग़ज़ल
अपने सीने के मिना में भी तह-ए-ख़ंजर-ए-इश्क़
जब कोई फ़िदया बदलता है ग़ज़ल होती है
अब्दुल मन्नान तरज़ी
ग़ज़ल
ढीला पड़ता था सूली का फंदा उस की गर्दन पर
मेरे क़ातिल को मुंसिफ़ ने फ़िदया ले कर छोड़ दिया
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
ग़ज़ल
हम अहल-ए-नज़ारा शाम-ओ-सहर आँखों को फ़िदया करते हैं
हम जल्वा जल्वा कहते हैं वो पर्दा पर्दा करते हैं
अफ़ीफ़ सिराज
ग़ज़ल
था हुक्म-ए-आम जो ज़र-ए-फ़िदया के वास्ते
दाख़िल हर एक इस में सिग़ार-ओ-किबार था
कैफ़ी चिरय्याकोटी
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ग़ज़ल
अस्ल फ़िदया सिर्फ़ एहसास-ए-नदामत है 'वली'
सीम-ओ-ज़र या सर किसी का ख़ूँ-बहा होता नहीं
वलीवुल हक़
ग़ज़ल
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो
बशीर बद्र
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
फ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं
क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं
अल्लामा इक़बाल
शेर
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सबा अकबराबादी
ग़ज़ल
नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया








