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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
सुनो 'ज़रयून' बस तुम ही सुनो यानी फ़क़त तुम ही
वही राहत में है जो आम से होने को अपना ले
जौन एलिया
अप्रचलित ग़ज़लें
بقدر لفظ و معنی فکرت احرام گریباں ہیں
وگر نہ کیجیے جو ذرہ عریاں ہم نمایاں ہیں
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
वस्फ़-ए-दंदाँ में दुर-ए-मज़मूँ की है हम को तलाश
बहर-ए-फ़िक्रत में दिला ग़ोता लगाना चाहिए
असद अली ख़ान क़लक़
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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है
हसरत मोहानी
शेर
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो







