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अब्दुल अज़ीज़ फ़ितरत

1905 - 1968 | रावलपिंडी, पाकिस्तान

ग़ज़ल 5

 

शेर 5

और भी कितने तरीक़े हैं बयान-ए-ग़म के

मुस्कुराती हुई आँखों को तो पुर-नम करो

मरना भी नहीं है अपने बस में

जीना भी अज़ाब हो गया है

हम तो तिरे ज़िक्र का हुए जुज़्व

तू ने हमें किस तरह भुलाया

'फ़ितरत' दिल-ए-कौनैन की धड़कन तो ज़रा सुन

ये हज़रत-ए-इंसाँ ही की अज़्मत का बयाँ है

हुस्न-ए-क़िस्मत से हमेशा 'फ़ितरत'

बख़्त बेदार रहा ख़्वाबों में

पुस्तकें 1

Kalam-e-Fitrat

 

1987

 

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