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नज़्म
एक थी औरत
जो गुंजान पेड़ों की शाख़ों से टकराए दिल को अनोखी पहेली बुझाए मगर वो पहेली समझ में न आए
मीराजी
नज़्म
बेवा की ख़ुद-कुशी
जितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान है
हर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान है
कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल
शहर-ए-दिल शहर-ए-ख़मोशाँ की तरह है गुंजान
कितना आबाद मगर शोर-ओ-शग़ब कुछ भी नहीं









