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गुलज़ार बुख़ारी

1949 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 14

शेर 5

जाने वालों की कमी पूरी कभी होती नहीं

आने वाले आएँगे फिर भी ख़ला रह जाएगा

चलूँ तो मस्लहत ये कह के पाँव थाम लेती है

वहाँ जाना भी क्या हासिल जहाँ से कुछ नहीं होता

ज़ाब्ते और ही मिस्दाक़ पे रक्खे हुए हैं

आज-कल सिदक़-ओ-सफ़ा ताक़ पे रक्खे हुए हैं

रंग-ओ-बू का शौक़ आशोब-ए-हवा में ले गया

तितलियाँ घर से निकल कर इब्तिला में खो गईं

कौन पस-ए-मंज़र में उजड़े पैकरों को देखता

शहर की नज़रें लिबास-ए-ख़ुशनुमा में खो गईं

क़ितआ 3

 

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