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जमाल पानीपती

1927 - 2005 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 4

 

शेर 2

दम-ब-दम उठती हैं किस याद की लहरें दिल में

दर्द रह रह के ये करवट सी बदलता क्या है

क्या हो गया गुलशन को साकित है फ़ज़ा कैसी

सब शाख़ शजर चुप हैं हिलता नहीं पत्ता भी

 

दोहा 6

मोती मूंगे कंकर पत्थर बचे कोई भाई

समय की चक्की सब को पीसे क्या पर्बत क्या राई

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दिया बुझा फिर जल जाए और रुत भी पल्टा खाए

फिर जो हाथ से जाए समय वो कभी लौट के आए

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कैसे कैसे वीर सूरमा जग में जिन का मान

जग से जीते समय से हारे समय बड़ा बलवान

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समय के सारे खेल हैं प्यारे कह गए जगत 'कबीर'

आप हँसाए आप रुलाये आप बँधाए धीर

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सदा उजला दिन ही रहे और सदा काली रेन

रंग बदलता जाए समय और टुक-टुक देखें नैन

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पुस्तकें 3

Mazameen-e-Saleem Ahmad

 

2009

Riwayat

Part-004

1987

रिवायत

Part-003

1986

 

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