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नज़्म
उस्ताद-ए-मोहतरम को मेरा सलाम कहना
जीने का फ़न सिखाया मरने का बाँकपन भी
इज़्ज़त के गुर बताए रुस्वाई के चलन भी
अहमद हातिब सिद्दीक़ी
नज़्म
उस्ताद का डंडा
जो मोहब्बत का न गुर आप ने जाना साहब
फिर तो दुश्वार हुआ पढ़ना पढ़ाना साहब
सय्यदा फ़रहत
ग़ज़ल
हम ने कब ये गुर सीखा हम ठहरे सीधे-सादे लोग
जिस की जैसी फ़ितरत देखें उस से वैसी बात करें
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
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ग़ज़ल
दुनिया वालों के मंसूबे मेरी समझ में आए नहीं
ज़िंदा रहना सीख रहा हूँ अब घर की वीरानी से
मोहसिन असरार
ग़ज़ल
अपने आप को गाली दे कर घूर रहा हूँ ताले को
अलमारी में भूल गया हूँ फिर चाबी अलमारी की
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल
ग़ज़ल
मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी
हास्य
सहेली इन की आ जाए तो समझो ईद है उन की
बिगड़ जाती हैं जब हम दोस्तों को घर बुलाते हैं
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
नन्ही जा सो जा
ग़ुस्से से क्यूँ घूर रही है मैं आ जाऊँगा
कह जो दिया है तेरे लिए इक गुड़िया लाऊँगा
हबीब जालिब
ग़ज़ल
तिरे मरीज़ के गुर सौ 'इलाज हों लेकिन
शिफ़ा न उस के नसीबों में हो तो क्यूँ-कर हो













