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ग़ज़ल
मैं अपने साथ जज़्बों की जमाअत ले के आया हूँ
जब इतने मुक़तदी हैं तो इमामत क्यूँ नहीं करते
फ़रहत एहसास
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
सबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त का
लिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत का
अल्लामा इक़बाल
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विषय
इबादत
इबादत शायरी
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ग़ज़ल
लगाएँ जो सरों की बाज़ियाँ ये काम उन का है
इमामत क्या करेंगे झुक के पानी माँगने वाले
मंज़र भोपाली
नज़्म
वहइ
'अक़्ल-ए-बे-माया इमामत की सज़ा-वार नहीं
राहबर हो ज़न-ओ-तख़मीं तो ज़ुबूँ कार-ए-हयात
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
फिर जो है बाग़-ए-नबुव्वत और इमामत की बहार
ग़ुंचा-ए-गुल सब्ज़ा-ए-अम्बर-फ़िशाँ को 'इश्क़ है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हमारी बन नहीं सकती कभी शैख़-ओ-बरहमन से
गुनाह वो जिस को कहते हैं वही अपनी इबादत है
प्रोफ़ेसर महमूद आलम
ग़ज़ल
बे-वुज़ू इश्क़ की तकमील है तौहीन-ए-सनम
कर रहे हैं तो सलीक़े से इबादत करिए








