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नज़्म
हिण्डोला
ये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीम
दिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानी
फ़िराक़ गोरखपुरी
उद्धरण
सआदत हसन मंटो
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ग़ज़ल
दिन-भर धूप में चलते चलते हम दोनों की शाम हुई है
थक कर बाँहों में सो जाना ये जिस्मानी प्यार न जानो
बशीर बद्र
नज़्म
आख़िरी रात
वो रूहानी वो जिस्मानी उक़ूबत कम हुई आख़िर
ग़ुलामी बेड़ियों के बोझ से बे-दम हुई आख़िर
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
हम कहाँ रूह की बातों में उलझ जाते हैं
दरमियाँ अपने तअल्लुक़ भी तो जिस्मानी है
धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़
ग़ज़ल
रग-ओ-पै में दर आता है 'शरर' हर शेर का नश्शा
ग़ज़ल को बारहा तरतीब-ए-जिस्मानी से पहचाना
कलीम हैदर शरर
नज़्म
क्यूँकि हम ख़ास लोग हैं
जज़्बाती या जिस्मानी तौर पर हलाक हो जाए
तो हमारी निय्यत पर शुबह न किया जाए
शौकत आबिदी
नज़्म
सब्र
जिस्मानी ज़ख़्म मुंदमिल होते वक़्त नहीं लगता
रूहानी ज़ख़्म पे मरहम कौन रखे













