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नज़्म
शिकवा
जुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ को
शिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ को
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ए'तिराफ़
मेरे साए से डरो तुम मिरी क़ुर्बत से डरो
अपनी जुरअत की क़सम अब मेरी जुरअत से डरो
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
तिरा नाम तक भुला दूँ, तिरी याद तक मिटा दूँ
मुझे इस तरह की जुरअत कभी थी न है न होगी
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
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नज़्म
जिब्रईल-ओ-इबलीस
है मिरी जुरअत से मुश्त-ए-ख़ाक में ज़ौक़-ए-नुमू
मेरे फ़ित्ने जामा-ए-अक़्ल-ओ-ख़िरद का तार-ओ-पू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दुआ
जिन का दीं पैरवी-ए-किज़्ब-ओ-रिया है उन को
हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले जुरअत-ए-तहक़ीक़ मिले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
इलाही क्या इलाक़ा है वो जब लेता है अंगड़ाई
मिरे सीने में सब ज़ख़्मों के टाँके टूट जाते हैं
जुरअत क़लंदर बख़्श
नज़्म
किसी को उदास देख कर
ख़फ़ा न होना मिरी जुरअत-ए-तख़ातुब पर
तुम्हें ख़बर है मिरी ज़िंदगी की आस हो तुम
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
ज़रूरत हो तो मर मिटने की हिम्मत हम भी रखते हैं
ये जुरअत ये शुजाअत ये बसालत हम भी रखते हैं
जोश मलसियानी
ग़ज़ल
उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर
मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है या मेरा
अल्लामा इक़बाल
शेर
मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब
'उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किया
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
कहीं बोसे की मत जुरअत दिला कर बैठियो उन से
अभी इस हद को वो कैफ़ी नहीं हुश्यार बैठे हैं


