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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
तुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदार
तुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनार
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रेख़्ता शब्दकोश
khaanaa.n
खानाँ کھاناں
رک : کھانا .
kahaa.n
कहाँ کَہاں
किधर, किस जगह, कब, एक प्रश्नवाचक अव्यय जिसका प्रयोग मुख्यतः स्थान के संबंध में जिज्ञासा या प्रश्न के प्रसंग में होता है
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नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
ऐ जान-ए-दर्द-मंदी ओ ईमान-ए-आरज़ू
ऐ शम-ए-तूर ओ यूसुफ़-ए-कनआ'न-ए-आरज़ू
जोश मलीहाबादी
नज़्म
लखनऊ
कुछ रोज़ का मुसाफ़िर-ओ-मेहमाँ हूँ और क्या
क्यूँ बद-गुमाँ हों यूसुफ़-ए-कनआ'न-ए-लखनऊ
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
मुद्दत से तेरी चाह-ए-ज़क़न में ग़रीक़ हूँ
बिल्लाह मुझ को यूसुफ़-ए-कनआ'न की क़सम
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है
चमन में ख़ुश-नवायान-ए-चमन की आज़माइश है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
न रहती यूसुफ़-ए-कनआँ' की गर्मी-ए-बाज़ार
मुक़ाबले में जो हम तुझ को रू-ब-रू करते
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
उधर मज़हब इधर इंसाँ की फ़ितरत का तक़ाज़ा है
वो दामान-ए-मह-ए-कनआँ है ये दस्त-ए-ज़ुलेख़ा है
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
वही है मिस्र में हर कूचा-ओ-बाज़ार की रौनक़
मगर हर बिकने वाला यूसुफ़-ए-कनआँ' नहीं होता
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
यूँ तो हर दौर में गिरते रहे इंसान के निर्ख़
इन ग़ुलामों में कोई यूसुफ़-ए-कनआँ न हुआ













