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ग़ज़ल
शकील बदायूनी
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काबा
काबा शायरी
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नज़्म
सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)
जिगर की आग नज़र की उमंग दिल की जलन
किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
फ़ितरत-ए-हुस्न तो मा'लूम है तुझ को हमदम
चारा ही क्या है ब-जुज़ सब्र सो होता भी नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
अना को मेरी बे-अंदाज़ा-तर बे-चारा कर डाला
मैं अपने आप में हारा हूँ और ख़्वाराना हारा हूँ
जौन एलिया
नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
गीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सही
तेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़
सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़
वरुन आनन्द
ग़ज़ल
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मिरे चारा-गर को नवेद हो सफ़-ए-दुश्मनाँ को ख़बर करो
जो वो क़र्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चुका दिया













