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नज़्म
बरसात की बहारें
होता है नाच घर घर घुंघरू झनक रहे हैं
पड़ता है मेंह झड़ा-झड़ तबले खड़क रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
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kha.Daa.ii
खड़ाई کَھڑائی
कपड़े की कच्ची सिलाई जो तैयारी की सिलाई से पहले उसके हिस्से जोड़ने को की जाए, कपड़े को खड़ा करना
kha.Daa
खड़ा کَھڑا
(जीव या पशु पक्षी) जो अपने पैरों के सहारे शरीर सीधा करके ऊपर उठा हो। जो झुका, बैठा या लेटा न हो। जैसे-नौकर सामने खड़ा था। पद-खड़े खड़े इतनी जल्दी की बैठने तक का अवकाश न हो। जैसे-वे आये और खड़े-खडे अपना काम निकालकर चल दिये। खड़ी सवारी = किसी के आने-जाने के संबंध में, आदर या व्यंग्य के लिए, चटपट, तुरन्त। जैसे-खड़ी सवारी आई और चली गई।
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ग़ज़ल
बुलबुल है चुप नसीम-ए-सहर भी ख़मोश है
शायद चमन में बर्ग-ए-ख़राबी खड़क गया
मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
ग़ज़ल
रौशन है फ़ज़ा शम्स कोई है न क़मर है
शाइ'र हूँ मुझे अर्श-ए-मुअल्ला की ख़बर है
हीरा लाल फ़लक देहलवी
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
निदा फ़ाज़ली
नज़्म
मुझ से पहले
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं
इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ







