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ग़ज़ल
देखो ना-उम्मीदी को ऐसे ठेंगा दिखलाते हैं
अक्सर अपने घर की कुंडी ख़ुद हम ने खटकाई यार
शमीम अब्बास
नज़्म
शिकवा
जुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ को
शिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ को
अल्लामा इक़बाल
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khataa.ii
खताई کَھتائی
(बर्तनों की ढलाई का काम) बर्तनों को ढालना, बर्तनों की सतह को चमकाना, चिकना करना
khaTaa.ii
खटाई کَھٹائی
इमली, टार्टरिक एसिड, अमचूर, खट्टे होने की अवस्था, गुण या भाव, कच्चे आम की फाँकें या उनका सफ़ूफ़, अमचूर
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ग़ज़ल
किया ख़ाक आतिश-ए-इश्क़ ने दिल-ए-बे-नवा-ए-'सिराज' कूँ
न ख़तर रहा न हज़र रहा मगर एक बे-ख़तरी रही
सिराज औरंगाबादी
शेर
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी
ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
जब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदा
तो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
परछाइयाँ
मग़रिब के मोहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ ख़ाकी-वर्दी-पोश आए
इठलाते हुए मग़रूर आए लहराते हुए मदहोश आए
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ात
हर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
पहले अपने पैकर-ए-ख़ाकी में जाँ पैदा करे
फूँक डाले ये ज़मीन-ओ-आसमान-ए-मुस्त'आर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लेनिन
जब तक मैं जिया ख़ेमा-ए-अफ़्लाक के नीचे
काँटे की तरह दिल में खटकती रही ये बात
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
वतन की सर-ज़मीं से इश्क़ ओ उल्फ़त हम भी रखते हैं
खटकती जो रहे दिल में वो हसरत हम भी रखते हैं
जोश मलसियानी
ग़ज़ल
इसी कौकब की ताबानी से है तेरा जहाँ रौशन
ज़वाल-ए-आदम-ए-ख़ाकी ज़ियाँ तेरा है या मेरा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
26 जनवरी
मुजरिम हूँ मैं अगर तो गुनहगार तुम भी हो
ऐ रहबरना-ए-क़ौम ख़ता-कार तुम भी हो








