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KHutan
ख़ुतन خُتَن
तातार (चीन) का एक क्षेत्र जहाँ के हिरन मशहूर हैं जिनके नाभि से उच्च कोटि का मुश्क निकलता है
khuuTaa
खूटा کُھوٹا
पत्थर, लकड़ी, लोहे आदि का वह टुकड़ा जो जमीन में खड़ा गाड़ा गया हो और जिसमें गाय, भैंस अथवा खेमों, नावों आदि की रस्सी बाँधी जाती हो। मुहा०-खूटा गाड़ना = (क) केंद्र निश्चित या निर्धारित करना। (ख) सीमा या हद बाँधना। तुम
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ग़ज़ल
तेरे क़दमों से जागेंगे उजड़े दिलों के ख़ुतन
पा-शिकस्ता ग़ज़ाल-ए-हरम सब्र कर सब्र कर
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
ठहरी ठहरी सी निगाहों में ये वहशत की किरन
चौंके चौंके से ये आहू-ए-ख़ुतन क्या कहना
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
यहाँ भी उस के सिवा और क्या नसीब हमें
ख़ुतन में रह के भी चश्म-ए-ग़ज़ाल ही के तो हैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
नहीं हवा में ये बू नाफ़ा-ए-ख़ुतन की सी
लपट है ये तो किसी ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन की सी
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे
हर लाला याँ है नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन मुझे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
कब्क ओ क़ुमरी में है झगड़ा कि चमन किस का है
कल बता देगी ख़िज़ाँ ये कि वतन किस का है
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
आरिज़ पे सिमटे ख़ुद-ब-ख़ुद ज़ुल्फ़ों के घूँगर वाले बाल
है नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
तसव्वुर जिस से रंगीं है तख़य्युल जिस से रक़्साँ है
ग़ज़ाल-ए-हिंद-ओ-आहू-ए-ख़ुतन की याद आती है
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
वतन-आशोब
चश्मक-ए-दम-ब-दम नहीं मश्क़-ए-ख़िराम-ओ-रम नहीं
मेरे ग़ज़ाल क्या हुए मेरे ख़ुतन को क्या हुआ








