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ग़ज़ल
अगर कुछ होश हम रखते तो मस्ताने हुए होते
पहुँचते जा लब-ए-साक़ी कूँ पैमाने हुए होते
सिराज औरंगाबादी
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ग़ज़ल
न दो दुश्नाम हम को इतनी बद-ख़़ूई से क्या हासिल
तुम्हें देना ही होगा बोसा ख़म-रूई से क्या हासिल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
चराग़-ए-मह सीं रौशन-तर है हुस्न-ए-बे-मिसाल उस का
कि चौथे चर्ख़ पर ख़ुर्शीद है अक्स-ए-जमाल उस का
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
कभी ग़मगीन होता हूँ कभी मैं मुस्कुराता हूँ
तुम्हें जब याद करता हूँ तो ख़ुद को भूल जाता हूँ
ख़लील अहमद
ग़ज़ल
नैना अँझूँ सूँ धोऊँ पग अप पलक सूँ झाडूँ
जे कुई ख़बर सो लियावे मुख फूल का तुम्हारा




