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ग़ज़ल
हाए वो वक़्त कि जब बे-पिए मद-होशी थी
हाए ये वक़्त कि अब पी के भी मख़्मूर नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
मद-होशी में एहसास के ऊँचे ज़ीने से गिर जाने दे
इस वक़्त न मुझ को थाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
चाँद तारों का बन
मुंतज़िर मर्द ओ ज़न
मस्तियाँ ख़त्म, मद-होशियाँ ख़त्म थीं, ख़त्म था बाँकपन












