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नज़्म
तेरी आवाज़
और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है
गीत बन कर तिरे होंटों पे मचल जाएगी
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
अनवर मिर्ज़ापुरी
नज़्म
रात सुनसान है
मैं उसे चाहूँ भी तो याद नहीं कर सकता
तू उसे खो के मचल सकता है रो सकता है
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
ज़िंदाँ की एक सुब्ह
दूर दरवाज़ा खुला कोई कोई बंद हुआ
दूर मचली कोई ज़ंजीर मचल के रोई











