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ग़ज़ल
शकील बदायूनी
नज़्म
रामायण का एक सीन
फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर
मायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूर
चकबस्त बृज नारायण
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नज़्म
यादें
हम ने इस अहमक़ को आख़िर इसी तज़ब्ज़ुब में छोड़ा
और निकाली राह मफ़र की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
गुमाँ का मुमकिन- जो तू है मैं हूँ
मगर मुझी को ये वहम शायद
कि आप-अपना सुबूत अपना जवाब हूँ मैं!
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
वो ग़म-ए-फ़िराक़ भी कट गया वो मलाल इश्क़ भी मिट गया
मगर आज भी तिरे हाथ में वही आस्तीं है कि तर भी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
शौक़ में उस के मज़ा दर्द में उस के लज़्ज़त
नासेहो उस से नहीं कोई मफ़र की सूरत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
जान जाते हैं पता 'आतिश' धुएँ से सब मिरा
सोचता रहता हूँ क्या कोई मफ़र मेरा भी है











