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शेर
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
रखते हो तुम क़दम मिरी आँखों से क्यूँ दरेग़
रुत्बे में महर-ओ-माह से कम-तर नहीं हूँ मैं
मिर्ज़ा ग़ालिब
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ग़ज़ल
महर ओ मह उस की फबन देख के हैरान रहे
जब वरक़ यार की तस्वीर-ए-दो-रू का निकला
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
दोस्ती का हाथ
हो लब पे नग़मा-ए-महर-ओ-वफा की ताबानी
किताब-ए-दिल पे फ़क़त हर्फ़-ए-इश्क़ हो तहरीर
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
हिण्डोला
ग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादू
शफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ से
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
आज़ादी
ये महर-ओ-माह ये तारे ये बाम हफ़्त-अफ़्लाक
बहुत बुलंद है इन से मक़ाम-ए-आज़ादी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दिल हसीं है तो मोहब्बत भी हसीं पैदा कर
दिल के हर क़तरे में तूफ़ान-ए-तजल्ली भर दे
बत्न-ए-हर-ज़र्रा से इक महर-ए-मुबीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
ख़ाक-ए-हिंद
शम-ए-अदब न थी जब यूनाँ की अंजुमन में
ताबाँ था महर-ए-दानिश इस वादी-ए-कुहन में
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
आधी रात
ज़मीं से ता-मह-ओ-अंजुम सुकूत के मीनार
जिधर निगाह करें इक अथाह गुम-शुदगी










