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नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
उरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ा
समझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
इशरत-ए-ख़ुल्द के लिए ज़ाहिद-ए-कज-नज़र झुके
मशरब-ए-इश्क़ में तो ये जुर्म है बंदगी नहीं
एहसान दानिश कांधलवी
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नअत
मशरब है मिरा तेरी तलब तेरा तसव्वुर
मस्लक है मिरा सिर्फ़ गदाई तिरे दर की
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
वो जानता है वुसअत-ए-मशरब के राज़ को
देखा है जिस ने आलम-ए-बे-इंतिहा-ए-क़ल्ब
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
नज़्म
सिरी कृष्ण
जो मशरब उस का न इस तरह आम हो जाता
जहाँ से महव मोहब्बत का नाम हो जाता
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
अज़ल से हक़-परस्ती बुत-परस्ती सुनते आते हैं
मगर ये आप का मशरब निराला ख़ुद-परस्ती है
जलील मानिकपूरी
ग़ज़ल
पिलाना पानी का जाम ज़ाहिद गुनाह मशरब में है हमारे
सवाब लेता नहीं है क्यूँ तू शराब मुझ को पिला पिला कर
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ग़ज़ल
रिंद-ए-मशरब कोई 'बेख़ुद' सा न होगा वल्लाह
पी के मस्जिद ही में ये ख़ाना-ख़राब आता है
बेख़ुद देहलवी
शेर
ये किस मज़हब में और मशरब में है हिन्दू मुसलमानो
ख़ुदा को छोड़ दिल में उल्फ़त-ए-दैर-ओ-हरम रखना
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
न मज़हब है न मशरब है कोई हम बादा-ख़्वारों का
हमें मशरब से क्या निस्बत हमें मज़हब से क्या मतलब
नूह नारवी
शेर
सुनो हिन्दू मुसलमानो कि फ़ैज़-ए-इश्क़ से 'हातिम'
हुआ आज़ाद क़ैद-ए-मज़हब-ओ-मशरब से अब फ़ारिग़














