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ग़ज़ल
ये अजब क़यामतें हैं तिरे रहगुज़र में गुज़राँ
न हुआ कि मर मिटें हम न हुआ कि जी उठें हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
मिटें बेचैनियाँ आख़िर दर-ओ-दीवार की कैसे
घरों में लोग रहते हैं दिलों में घर नहीं रहता
परविंदर शोख़
ग़ज़ल
दाग़ जो अब तक अयाँ हैं वो बता कैसे मिटें
फ़ासले जो दरमियाँ हैं वो बता कैसे मिटें
शिवकुमार बिलग्रामी
नज़्म
रात की बात
''ज़ुल्फ़ें यूँ चेहरे पे बिखरी हुई माँगें थीं दिल
जिस तरह एक खिलौने पे मिटें दो बालक''
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
एक हैं अहद
अपनी आँखों में जलाएँ हम मोहब्बत के चराग़
सब के ज़ेहनों से मिटें गुज़रे हुए लम्हों के दाग़
यूनुस मख़्मूर
ग़ज़ल
हर किसी के नाम में तख़सीस होनी चाहिए
क्यों न ऐ 'बिस्मिल' मिटें हम ख़ंजर-ए-जल्लाद पर







