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नज़्म
दो इश्क़
गरजे हैं बहुत शैख़ सर-ए-गोशा-ए-मिम्बर
कड़के हैं बहुत अहल-ए-हकम बर-सर-ए-दरबार
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
शैख़-ए-हराम-लुक़्मा की पर्वा है क्यूँ तुम्हें
मस्जिद भी उस की कुछ नहीं मिम्बर भी कुछ नहीं
जौन एलिया
ग़ज़ल
सर-ए-मक़्तल जिन्हें जाना था वो जा भी पहुँचे
सर-ए-मिंबर कोई मोहतात ख़तीब आज भी है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
दिलदार देखना
ख़ाली हैं गरचे मसनद ओ मिम्बर, निगूँ है ख़ल्क़
रोअब-ए-क़बा ओ हैबत-ए-दस्तार देखना
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मस्जिद
ताक़ में शम्अ के आँसू हैं अभी तक बाक़ी
अब मुसल्ला है न मिम्बर न मुअज़्ज़िन न इमाम
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
करम-ए-मसनद-ओ-मिम्बर कि अब अरबाब-ए-हकम
ज़ुल्म कर चुकते हैं तब मर्ज़ी-ए-रब पूछते हैं


