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ग़ज़ल
आशियाँ कुंज-ए-क़फ़स से भी गिराँ-तर हो 'सहर'
गर मुआविन पर-ए-पर्वाज़ न होने पाए
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
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कहानी
وہ گنتی میں پانچ تھے، پورے پانچ۔ زرد رو اور پژمردہ سے چھوکرے۔۔۔ یوں دکھائی دیتا تھا جیسے ج...
राजिंदर सिंह बेदी
नज़्म
मेरी होली
इक नई दुनिया की ख़िल्क़त है मिरी तख़्ईल में
जो मुआविन हो सके इंसान की तकमील में
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
आँखें
ये आँखें दफ़्तरों की फ़ाइलों पर ग़ौर करती हैं
उन्हें तरतीब देने में मु'आविन हैं
शोएब कियानी
ग़ज़ल
अभी तो माफियाओं के मज़ालिम ही बरसते थे
हुकूमत क्यूँ मुआविन बन गई वहशत में दहशत में
इरफान आबिदी मानटवी
नज़्म
कतबा(3)
मिरा कोई हमदर्द मेरा मुआविन
जो आए और आ कर मिरे सादा कतबे पे अपना भला सा कोई नाम लिख दे
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
मौत की ख़ुश्बू
जुदाई मोहब्बत के दरिया-ए-ख़ूँ की मुआविन नदी है
वफ़ा याद की शाख़-ए-मर्जां से लिपटी हुई है
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
निगाह-ए-अद्ल से देखें तो मीर-ए-महफ़िल के
जलाल-ओ-माल मुआविन हैं ऐब-पोशी में











