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ग़ज़ल
सुब्ह तक हम रात का ज़ाद-ए-सफ़र हो जाएँगे
तुझ से हम-आग़ोश हो कर मुन्तशर हो जाएँगे
फ़ुज़ैल जाफ़री
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ग़ज़ल
अतीक़ुल्लाह
ग़ज़ल
मैं तिश्नगी का करूँ जो शिकवा तराश मेरी ज़बान साक़ी
मगर बता दे ख़ता है किस की जो मै-कदा मुन्तशर हुआ है
नौशाद मुनीस आज़मी
ग़ज़ल
मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर
ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सबा अकबराबादी
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
जिन की राह-ए-तलब से हमारे क़दम
मुख़्तसर कर चले दर्द के फ़ासले



