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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
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शेर
जो आला-ज़र्फ़ होते हैं हमेशा झुक के मिलते हैं
सुराही सर-निगूँ हो कर भरा करती है पैमाना
हैदर अली आतिश
नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
निशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचीं
तिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़दशा
मैं किस तरह तुझे लफ़्ज़ों का पैरहन बख़्शूँ
मिरे हुनर की बुलंदी तो सर-निगूँ है अभी
मोहसिन नक़वी
नज़्म
किसान
सर-निगूँ रहती हैं जिस से क़ुव्वतें तख़रीब की
जिस के बूते पर लचकती है कमर तहज़ीब की
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
वो मिरे अख़्तर-ए-ताले की है वाज़ूँ गर्दिश
कि फ़लक को भी निगूँ-सार लिए फिरती है
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
नज़्म
शाम
सर-निगूँ बैठा है चुप-चाप न जाने कब से
इस तरह है कि पस-ए-पर्दा कोई साहिर है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
आलम कितने
इक ज़रा सब्र कि इन सुर्ख़ घटाओं के तले
सर-निगूँ होंगे यहाँ ख़ाक पे परचम कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
आधी रात
ज़मीं से ता-मह-ओ-अंजुम सुकूत के मीनार
जिधर निगाह करें इक अथाह गुम-शुदगी










