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नज़्म
एक पहाड़ और गिलहरी
कोई पहाड़ ये कहता था इक गिलहरी से
तुझे हो शर्म तो पानी में जा के डूब मरे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
दिन ही पहाड़ है शब-ए-ग़म क्या हो क्या न हो
घबरा रहे हैं आज सर-ए-शाम ही से हम
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता
यगाना चंगेज़ी
नज़्म
रामायण का एक सीन
जंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़र
रहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बर
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
हिण्डोला
यही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़
यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँद



