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ग़ज़ल
शौक़ तिरा है मौजज़न ज़ौक़ तिरा बहाना-जू
खोल न दें भरम कहीं परद ज्ञान राज़ का
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
नज़्म
ख़ूब-सूरत मोड़
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
शिकस्त-ए-नारवा ने मुझ को पारा पारा कर डाला
अना को मेरी बे-अंदाज़ा-तर बे-चारा कर डाला
जौन एलिया
नज़्म
कोई ये कैसे बताए
इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन
उन के सीने में समा जाए हमारी धड़कन
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
ऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
उस जान-ए-हया का बस नहीं कुछ बे-बस है पराए बस में है
अख़्तर शीरानी
नज़्म
परछाइयाँ
मुझे यक़ीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान कि हम मिल के भी पराए हैं









