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ग़ज़ल
पेश-ए-नज़र है पस्त-ओ-बुलंद-ए-रह-ए-जुनूँ
हम बे-ख़ुदों से क़िस्सा-ए-अर्ज़-ओ-समा न पूछ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
गुमाँ का मुमकिन- जो तू है मैं हूँ
मगर समावी ख़िराम वाले
जो पस्त ओ बाला के आस्ताँ पर जमे हुए हैं
नून मीम राशिद
नज़्म
नशात-ए-उमीद
तू ने ही राँझे की ये बंधवाई आस
हीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पास
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
दार-उल-मकाफ़ात
याँ हर-दम झगड़े उठते हैं हर-आन अदालत बस्ती है
गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तवाइफ़
अपनी फ़ितरत की बुलंदी पे मुझे नाज़ है कब
हाँ तिरी पस्त-निगाही से गिला है मुझ को
मुईन अहसन जज़्बी
ग़ज़ल
ये नज़र नज़र तबाही ये क़दम क़दम मुसीबत
कहीं पस्त हो न जाए मिरा अज़्म-ए-फ़ातेहाना
नाज़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
बुलंद ओ पस्त दुनिया फ़ैसला करने नहीं देती
कि गिरना चाहता हूँ या सँभलना चाहता हूँ मैं
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
फ़र्श से मुतमइन नहीं पस्त है ना-पसंद है
अर्श बहुत बुलंद है ज़ौक़-ए-नज़र को क्या करूँ





