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ग़ज़ल
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यूँ हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
इश्क़ में सर फोड़ना भी क्या कि ये बे-मेहर लोग
जू-ए-ख़ूँ को नाम दे देते हैं जू-ए-शीर का
अहमद फ़राज़
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ग़ज़ल
ये जीना भी क्या जीना है सर फोड़ना ठहरा
क़िस्मत को है जब वास्ता पत्थर के सनम से







