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नज़्म
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
वो तीर हो सागर की रुत छाई हो फागुन की
फूलों से महकती हो पुर्वाई घने बन की
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुर्वाई भी
जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर
जाँ निसार अख़्तर
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ग़ज़ल
सारे रिश्ते जेठ-दुपहरी गर्म हवा आतिश अंगारे
झरना दरिया झील समुंदर भीनी सी पुर्वाई अम्माँ
आलोक श्रीवास्तव
हिंदी ग़ज़ल
शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम
ज़िंदगी है धूप, तो मद-मस्त पुर्वाई सी तुम
कुंवर बेचैन
ग़ज़ल
ऐ पुर्वाई मेरी ख़ुशबू उस चौखट के दम से है
तू भी गुज़र के देख जहाँ मैं ने कुछ लम्हे गुज़ारे हैं













