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नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
ना-रसाई अगर अपनी तक़दीर थी
तेरी उल्फ़त तो अपनी ही तदबीर थी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
कहाँ मेरे दिल की हसरत, कहाँ मेरी ना-रसाई
कहाँ तेरे गेसुओं का, तिरे दोश पर बिखरना
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआ
है पर-ए-मुर्ग़-ए-तख़य्युल की रसाई ता-कुजा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
इक ऐसी फ़ज़ा जिस तक ग़म की न रसाई हो
दुनिया की हवा जिस में सदियों से न आई हो
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
ताकि मैं जानूँ कि है उस की रसाई वाँ तलक
मुझ को देता है पयाम-ए-वादा-ए-दीदार-ए-दोस्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
हरीम-ए-नाज़ में उस की रसाई हो तो क्यूँकर हो
कि जो आसूदा ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार हो जाए






