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नज़्म
ज़िंदगी से डरते हो
दौर ना-रसाई के ''बे-रिया'' ख़ुदाई के
फिर भी ये समझते हो हेच आरज़ू-मंदी
नून मीम राशिद
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
ना-रसाई अगर अपनी तक़दीर थी
तेरी उल्फ़त तो अपनी ही तदबीर थी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
कहाँ मेरे दिल की हसरत, कहाँ मेरी ना-रसाई
कहाँ तेरे गेसुओं का, तिरे दोश पर बिखरना






