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नज़्म
रिश्वत
लोग अटकाते हैं क्यूँ रोड़े हमारे काम में
जिस को देखो ख़ैर से नंगा है वो हम्माम में
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मुझे अभी बहुत दूर जाना है
क्या पैरों की थकन इस सफ़र को रोक सकती है
क्या रास्ते के रोड़े मेरे इरादे को तोड़ सकते हैं
ख़लील मामून
ग़ज़ल
क्या भला शैख़-जी थे दैर में थोड़े पत्थर
कि चले काबा के तुम देखने रोड़े पत्थर
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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ग़ज़ल
खाइयाँ हैं खड्डे रोड़े हैं कंकर पत्थर हैं लेकिन
जन्नत के रस्ते लगते हैं सारे रस्ते गाँव के
इफ़्तिख़ार हैदर
ग़ज़ल
किसी से आस क्या रखना मुदावा क्यों करे कोई
जो हम ख़ुद आप अटकाते हैं वो रोड़े नहीं जाते
सुहैब फ़ारूक़ी
नज़्म
बच्चों का क्लब
तफ़रीह के सारे कामों में जब रोड़े सब अटकाते थे
जब खेल का नाम आ जाता था बल तेवरी पर पड़ जाते थे
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
क़दम मिला के चलो
हज़ार मुश्किलें इक जस्त में उबूर करो
हर एक रोड़े को ठोकर से चूर-चूर करो
राम लाल वर्मा हिंदी
नज़्म
रक़ीब से!
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन के
अश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
