aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "saa.ebaanii"
सरमद सहबाई
born.1945
शायर
अर्श सहबाई
1930 - 2020
ज़फ़र सहबाई
born.1946
असर सहबाई
1901 - 1963
सरशार सैलानी
1914 - 1969
हाफ़िज़ महमूद शीरानी
1888 - 1946
लेखक
मौलवी इमाम बख़श सहबाई
1802-3 - 1857
तनवीर सामानी
सय्यद अशरफ़ जहाँगीर समनानी
1289 - 1405
क़ुद्दूस सहबाई
मोहम्मद इक़बाल सलमानी
हाफ़िज़ हम्ज़ा सलमानी
born.2001
सोबान सईद
भीष्म साहनी
1915 - 2003
सय्यद अनवार अहमद समनानी
है सवा-नेज़े पे सूरज का अलमतेरे ग़म की साएबानी भी नहीं
धूप लगती है बादलो जैसीये मोहब्बत की साएबानी है
मिरे साए में सब हैं मेरे सिवाकोई तो मिरी साएबानी करे
रवाबित धूप से हैं अब तुम्हारेबहुत बे-साएबानी हो गई क्या
सुलगते दश्त में अब धूप सहना पड़ गई हैतुम्हारी साएबानी ख़त्म होती जा रही है
साएबान سائیبان
رک : سایہ بان.
सारबानी سارْبانی
सारबान का काम
शेबानी شیبانی
भेड़ें चराना, बकरियाँ चराना
साएबान سائِبان
घर के आगे या छत पर लगाया गया शेड, छप्पर, कपड़े की छत
Punjab Mein Urdu
भाषा
हाफ़िज़ महमूद शीरानी और उनकी इल्मी-ओ-अदबी ख़िदमात
मज़हर महमूद शीरानी
आलोचना
लताइफ़-ए-अशरफ़ी
फ़रहंग-ए-तिलमिहात
शब्द-कोश
Mukammal Safarnama Makhdum Jahaniyan Jahangasht Jahangir
सफ़र-नामा / यात्रा-वृतांत
Sair-e-Mohammadi
मोहम्मद अली सामानी
इस्लामिक इतिहास
Tareekh-e-Shair Shahi
अब्बास ख़ाँ सरवानी
भारत का इतिहास
Kulliyat-e-Akhtar Sheerani
अख़्तर शीरानी
कुल्लियात
Tuzk-e-Mahboobiya
गुलाम सम्दानी ख़ान गौहर हैदरबादी
Maqalat-e-Hafiz Mahmood Shirani
मज़ामीन / लेख
अमीर ख़ुसरो
सय्यद ग़ुलाम समनानी
चिश्तिय्या
Hayat-e-Syed Ashraf Jahangir Samnani
सय्यद वहीद अशरफ़ कछौछवी
तारीख़-ए-इलाहबाद
सय्यद मक़बूल अहमद समदानी
ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप मेंआग होती जा रही है ज़िंदगानी धूप में
'ज़हीर' होती तो क्यों पूजता मैं पेड़ों कोफ़लक से धूप मयस्सर थी साएबानी कहाँ
टूट जाएगी दीवार जितनी भी मज़बूत होउस के एहसास की धूप भी साएबानी नहीं
मुझे तो धूप से भी इस क़दर न ख़ौफ़ आयामिला है ख़ौफ़ जो अब तेरी साएबानी में
बूढ़ा बरगद पी गया सूरज की आगधूप कैसी साएबानी दे गया
मुझे तो दश्त-ए-तमन्ना की धूप काम आईऐ 'हादिया' मिरी मिट्टी की साएबानी में
ख़िज़ाँ-आलूद शाख़ों पर परिंदे भी नहीं आएइसी बे-साएबानी में बरहना-सर थी तन्हाई
वो पेड़ जिस में फ़क़त बे-लिबास शाख़ें थींउसी से काम लिया मैं ने साएबानी का
पहले तो सूरज को ला कर रख दिया सर पर मिरेअब दिखावे के लिए ये साएबानी मत करो
इस से उम्मीद-ए-साएबानी हैइस शजर को हरा-भरा रखना
वक़्त के जलते हुए सूरज की तपती धूप मेंइस की यादों के शजर हैं साएबानी के लिए
ख़िज़ाँ-आलूद शाख़ों पर परिंदे भी नहीं आएइसी बे-साएबानी में बरहना सर थी तन्हाई
तुम ने क्या क्या सौंप डाले मस्लहत की धूप कोसाएबानी के सफ़र का सिलसिला कुछ और था
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