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ग़ज़ल
नहीं है तल्ख़-गोई शेवा-ए-संजीदगाँ लेकिन
मुझे वो गालियाँ देंगे तो क्या चुप साध लूँगा मैं
अनवर शऊर
नज़्म
ये कैसी जंग है
ये कैसी जंग है जिस में मुक़ाबले के बग़ैर
निशाना साध के गोली चलाई जाती है











