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ग़ज़ल
भीड़ बाज़ार-ए-समा'अत में है नग़्मों की बहुत
जिस से तुम सामने उभरो वो सदा दो हम को
एहसान दानिश कांधलवी
नज़्म
लहू का सुराग़
किसी को बहर-ए-समाअत न वक़्त था न दिमाग़
न मुद्दई न शहादत हिसाब पाक हुआ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वही नर्म लहजा
धनक गीत बन के समाअ'त को छूने लगी हो
शफ़क़ नर्म कोमल सुरों में कोई प्यार की बात कहने चली हो
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
फिर नग़्मा-हा-ए-क़ुम तो फ़ज़ा में हैं गूँजते
तू ही हरीफ़-ए-ज़ौक़-ए-समाअत नहीं रहा













