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रंगीन सआदत यार ख़ाँ

1756 - 1835 | लखनऊ, भारत

उर्दू शायरी की विधा ' रेख़्ती ' के लिए प्रसिद्ध जिसमें शायर औरतों की भाषा में बोलता है

उर्दू शायरी की विधा ' रेख़्ती ' के लिए प्रसिद्ध जिसमें शायर औरतों की भाषा में बोलता है

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

ग़ज़ल 10

शेर 9

बादल आए हैं घिर गुलाल के लाल

कुछ किसी का नहीं किसी को ख़याल

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ज़ुल्म की टहनी कभी फलती नहीं

नाव काग़ज़ की कहीं चलती नहीं

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झूटा कभी झूटा होवे

झूटे के आगे सच्चा रोवे

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वो आए तो तू ही चल 'रंगीं'

इस में क्या तेरी शान जाती है

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पा-बोस-ए-यार की हमें हसरत है नसीम

आहिस्ता आइओ तू हमारे मज़ार पर

रेख़्ती 13

पुस्तकें 11

Deewan-e-Rangeen

Istelahat-e-Begmaat

 

Deewan-e-Rangeen, Insha

Insha-o-Rangeen Ka Begamaati Kalam

1924

इजाद-ए-रंगीन

 

1852

Fars Nama-e-Rangeen

 

1876

Intikhab-e-Rekhti

 

1983

Majalis-e-Rangeen

 

1990

Majalis-e-Rangeen

 

1929

मसनवी-ए-रंगीन

 

1845

Musaddas-e-Rangeen

 

1952

Rekhti

Urdu Ke Rekhti Go Shora Ka Kalam

2006

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