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ग़ज़ल
सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की कियारी है
परी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधन से मारी है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
कल की बात
सामने अम्माँ वहीं खोले पिटारी अपनी
मुँह भरे पान से समधन की इन्हीं बातों पर
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
गुड्डे गुड़िया का ब्याह
शकीला ने सोचा कि शादी रचाएँ
जमीला सहेली को समधन बनाएँ
मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर
रेख़्ती
समझो मतलब तो ज़रा क्या किया समधन ने मिरी
ता'न की ता'न है ये और अजी बात की बात
मीर यार अली जान
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samdhan
समधन سَمْدَھن
समधी की पत्नी, संबंध में किसी के पुत्र या पुत्री की सास, दूल्हा और दुल्हन की माएं (जो एक दूसरे की समधिन होती हैं)
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ग़ज़ल
समझें भी दोनों कर रही हैं क्या ये चार पाँच
लौंडी के यार चार हैं बीबी के यार पाँच
शैदा इलाहाबादी
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
रक़ीब से!
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
कुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझा
मुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है
जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है
वसीम बरेलवी
ग़ज़ल
क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है


