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ग़ज़ल
सिज्न ओ जन्नत दोनों ऐ काफ़िर हैं इस दुनिया के नाम
वो अज़ल से बख़्त-ए-मोमिन ये तिरी तक़दीर है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
मैं अपने शहर-ए-इल्म-ओ-फ़न का था इक नौजवाँ काहिन
मिरे तिल्मीज़-ए-इल्म-ओ-फ़न मिरे बाबा के थे हम-सिन
जौन एलिया
ग़ज़ल
सिराज औरंगाबादी
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ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
नज़्म
एक लड़का
कभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम ओ दिल-रफ़्ता
कभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता
अख़्तरुल ईमान
शेर
अभी कम-सिन हो रहने दो कहीं खो दोगे दिल मेरा
तुम्हारे ही लिए रक्खा है ले लेना जवाँ हो कर
दाग़ देहलवी
नज़्म
जुगनू
इसी तरह कई बरसातें आईं और गईं
मैं रफ़्ता रफ़्ता पहुँचने लगा ब-सिन्न-ए-शुऊर





